ग्वालियर हाईकोर्ट परिसर में डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा स्थापना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यह मामला न्यायपालिका की निष्पक्षता, सामाजिक समरसता और विधिक प्रक्रिया के पालन से जुड़ा हुआ है।
विवाद की शुरुआत
मार्च 2025 में ग्वालियर हाईकोर्ट परिसर में डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित करने की योजना सामने आई। एडवोकेट धर्मेंद्र कुशवाह और विश्वजीत रतौनिया जैसे अधिवक्ताओं के प्रयासों से प्रतिमा स्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई। हालांकि, बार एसोसिएशन ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति मूर्तियां स्थापित करने पर रोक लगाई गई है ।
वकीलों के बीच मतभेद
इस मुद्दे पर वकील दो गुटों में बंट गए हैं। बार एसोसिएशन ने रेड रिबन बांधकर विरोध प्रदर्शन किया, जबकि एससी-एसटी-ओबीसी समुदाय के वकीलों ने इसे संविधान निर्माता का अपमान बताते हुए प्रतिमा स्थापना की मांग की । अजाक्स संगठन ने भी बार एसोसिएशन के विरोध के खिलाफ जिला कलेक्टर को ज्ञापन देने की तैयारी की ।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने इस विवाद को जातिवादी मानसिकता का प्रतीक बताते हुए अंबेडकर की प्रतिमा को यथाशीघ्र स्थापित करने की मांग की । उन्होंने कहा कि ऐसे विवाद संविधान और बाबा साहेब अंबेडकर के योगदान का अपमान हैं।
प्रशासनिक स्थिति
ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान ने स्पष्ट किया कि कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद प्रतिमा लगाने की मंजूरी दी गई है, और इसका पूरा खर्च वकीलों द्वारा उठाया जाएगा । हालांकि, बार एसोसिएशन ने इस अनुमति को अनुचित बताते हुए विरोध दर्ज कराया है।
निष्कर्ष
ग्वालियर हाईकोर्ट परिसर में डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा स्थापना को लेकर उत्पन्न विवाद न्यायपालिका की गरिमा, सामाजिक समरसता और विधिक प्रक्रिया के पालन से जुड़ा हुआ है। इस मुद्दे पर सभी पक्षों को संवेदनशीलता और समझदारी से काम लेना चाहिए, ताकि संविधान निर्माता के प्रति सम्मान बना रहे और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर कोई आंच न आए।
No comments:
Post a Comment