ग्रीन फ्यूल का 'ब्लू' संकट: क्या 1 लीटर इथेनॉल के लिए 10,000 लीटर पानी बहाना सही है?
ग्लोबल वार्मिंग, तीव्र जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन की वैश्विक चिंताओं के बीच आज संपूर्ण विश्व जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) के सुरक्षित और टिकाऊ विकल्पों की खोज में जुटा है। इस दिशा में 'बायोफ्यूल' या जैव-ईंधन को एक अभूतपूर्व क्रांति के रूप में देखा गया है। भारत ने भी अपनी दूरगामी ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने, विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने और घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था को गति देने के उद्देश्य से इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (Ethanol Blending Programme - EBP) को अपनी मुख्य राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनाया है। सरकार का लक्ष्य बेहद स्पष्ट और सराहनीय है - पर्यावरण को बचाना और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को कम करना।
परंतु, किसी भी बड़े बदलाव के पीछे छिपे वैज्ञानिक और पर्यावरणीय अंतर्विरोधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालिया वैश्विक शोधों, पर्यावरणविदों की चेतावनियों और जमीनी आंकड़ों ने एक बेहद डरावनी और चौंकाने वाली हकीकत को देश के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। जिस 'ग्रीन फ्यूल' (हरित ईंधन) को हम वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ एक अचूक हथियार मान रहे हैं, वह भारत के अत्यंत सीमित और अमूल्य जल संसाधनों (Water Resources) के लिए एक गंभीर और विनाशकारी संकट बनता जा रहा है। शोध के आंकड़ों के अनुसार, भारत में पारंपरिक तरीकों से मात्र 1 लीटर इथेनॉल के उत्पादन के लिए औसतन 10,000 लीटर पानी की खपत हो रही है। यह चौंकाने वाला अनुपात इस बुनियादी सवाल को जन्म देता है: क्या हम वायु प्रदूषण की समस्या को हल करने की जल्दबाजी में देश को एक भीषण जल-संकट और मरुस्थलीकरण (Desertification) की ओर धकेल रहे हैं?
चक्रव्यूह: गन्ने की खेती और पानी का जटिल गणित
भारत में इथेनॉल का निर्माण मुख्य रूप से 'फर्स्ट जनरेशन' (1G) फीडस्टॉक यानी गन्ने के रस, शीरे (Molasses) और भारी मात्रा में अनाजों (जैसे मक्का और भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में सड़ने वाले चावल) से किया जा रहा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है, जिसके कारण इथेनॉल निर्माण के लिए गन्ने को सबसे सुलभ और प्राथमिक विकल्प माना गया। लेकिन यहीं से इस नीति का सबसे कमजोर और चिंताजनक पहलू शुरू होता है। गन्ना स्वभाव से एक 'वॉटर-इंटेन्सिव' (Water-Intensive) यानी अत्यधिक पानी सोखने वाली फसल है।
भारतीय कृषि पद्धतियों में गन्ने की सिंचाई के लिए आज भी बड़े पैमाने पर पारंपरिक 'फ्लड इरिगेशन' (बाढ़ सिंचाई या खुला पानी छोड़ना) तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस पद्धति में पानी की बर्बादी का स्तर अत्यधिक ऊंचा है। यदि हम बीज बोने से लेकर, फसल की कटाई, मिलों में गन्ने की पेराई, और अंततः डिस्टिलरी (Distillery) के भीतर गन्ने के रस को इथेनॉल में बदलने की पूरी प्रक्रिया के 'वॉटर फुटप्रिंट' का वैज्ञानिक आकलन करें, तो गणित बेहद भयावह बैठता है। गन्ने की खेती के दौरान वाष्पीकरण, भूजल का अत्यधिक दोहन और रिफाइनिंग प्रक्रियाओं में प्रयुक्त शुद्ध जल मिलकर प्रति लीटर इथेनॉल पर पानी की खपत को 10,000 लीटर के स्तर तक पहुंचा देते हैं।
भारत का इथेनॉल ब्लेंडिंग टारगेट और उसका नीतिगत ढांचा
भारत सरकार ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत अपने लक्ष्यों को और अधिक आक्रामक बनाते हुए वर्ष 2025-26 तक पेट्रोल में E20 (20% इथेनॉल मिश्रण) के लक्ष्य को हासिल करने की समयसीमा तय की है। वर्तमान में देश 10% से अधिक के मिश्रण स्तर को पार कर चुका है। इस नीति के आर्थिक और सामरिक लाभ निसंदेह बहुत बड़े हैं:
- विदेशी मुद्रा की बचत: कच्चे तेल (Crude Oil) के आयात बिल में प्रतिवर्ष अरबों डॉलर की कमी आएगी, जिससे देश का व्यापार घाटा संतुलित होगा।
- किसानों को प्रत्यक्ष लाभ: चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, जिससे गन्ना किसानों का बकाया भुगतान समय पर हो सकेगा और उनकी आय में वृद्धि होगी।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी: वाहनों से निकलने वाले हानिकारक कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन के स्तर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जाएगी।
लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि 20% ब्लेंडिंग के इस विशाल लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश को हर साल लगभग 10 अरब लीटर से अधिक इथेनॉल की आवश्यकता होगी। यदि इस मांग का एक बड़ा हिस्सा केवल गन्ने और पानी सोखने वाले अनाजों से पूरा किया गया, तो कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाला दबाव अकल्पनीय होगा। इसके लिए लाखों हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि पर गन्ने की खेती करनी होगी, जो देश के बचे-खुचे जल संसाधनों को पूरी तरह निचोड़ देगी।
तुलनात्मक विश्लेषण: पारंपरिक पेट्रोल बनाम इथेनॉल मिश्रित ईंधन (E20)
ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा के बीच संतुलन को समझने के लिए निम्नलिखित तालिका एक स्पष्ट दृष्टिकोण प्रदान करती है:
| मूल्यांकन पैरामीटर | पारंपरिक पेट्रोलियम ईंधन | इथेनॉल मिश्रित ईंधन (E20) |
|---|---|---|
| वायुमंडलीय कार्बन उत्सर्जन | अत्यधिक उच्च (ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारक) | तुलनात्मक रूप से 20-25% तक कम उत्सर्जन |
| जल फुटप्रिंट (Water Footprint) | बेहद कम (केवल रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग स्तर पर) | अत्यधिक उच्च (खेती से लेकर डिस्टिलेशन तक भारी खपत) |
| आर्थिक प्रभाव एवं विदेशी मुद्रा | विदेशी आयात पर पूर्ण निर्भरता, भारी मुद्रा का नुकसान | घरेलू कृषि को प्रोत्साहन, अरबों डॉलर की बचत |
| दीर्घकालिक भूजल प्रभाव | शून्य प्रत्यक्ष प्रभाव (स्थानीय जल स्रोतों पर) | गंभीर नकारात्मक प्रभाव (जल स्तर का अत्यधिक गिरना) |
जल संकट के दूरगामी और भयावह परिणाम
नीति आयोग और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की विभिन्न रिपोर्टों में लगातार चेतावनी दी गई है कि यदि भारत अपनी जल-नीतियों और कृषि पद्धतियों में क्रांतिकारी बदलाव किए बिना इसी रफ्तार से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देता रहा, तो देश को निम्नलिखित बहुआयामी संकटों का सामना करना पड़ सकता है:
1. उपजाऊ भूमियों का मरुस्थलीकरण (Desertification)
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे भारत के अन्न भंडार कहे जाने वाले क्षेत्र पहले से ही 'डार्क ज़ोन' (जहाँ भूजल का पुनर्भरण होने की तुलना में दोहन कहीं अधिक है) में तब्दील हो रहे हैं। गन्ने और मक्के जैसी फसलों के लिए ट्यूबवेलों के माध्यम से दिन-रात जमीन का सीना चीरकर पानी निकालना इन क्षेत्रों की मिट्टी को हमेशा के लिए बंजर और बेजान बना सकता है।
2. खाद्य बनाम ईंधन का गंभीर अंतर्विरोध (Food vs Fuel Dilemma)
जब किसानों को भोजन के लिए अनाज उगाने के बजाय ईंधन के लिए फसल उगाने में अधिक आर्थिक लाभ दिखाई देगा, तो वे अपनी प्राथमिकताओं को बदल देंगे। यदि उपजाऊ भूमि का उपयोग इंसानों का पेट भरने वाली फसलों (जैसे दलहन, तिलहन और सब्जियां) के बजाय गाड़ियों के टैंक भरने वाले ईंधन के लिए फीडस्टॉक उगाने में होने लगा, तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट मंडराने लगेगा और खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) अनियंत्रित हो जाएगी।
3. पीने के पानी की भीषण किल्लत
कृषि क्षेत्र पहले से ही भारत के कुल उपलब्ध ताजे पानी (Freshwater) का लगभग 80% से 85% हिस्सा उपभोग करता है। इथेनॉल की इस अंधी दौड़ के कारण जब यह उपभोग और बढ़ेगा, तो शहरों और ग्रामीण इलाकों में आम जनता के लिए शुद्ध पेयजल (Drinking Water) का संकट अत्यधिक गहरा जाएगा।
समाधान की राह: धारणीय और संतुलित ऊर्जा नीति
क्या इसका अर्थ यह है कि भारत को इथेनॉल ब्लेंडिंग का विचार पूरी तरह छोड़ देना चाहिए? बिल्कुल नहीं। समाधान इस नीति को बंद करने में नहीं, बल्कि इसे सस्टेनेबल (Sustainable) या धारणीय बनाने में है:
१. सेकंड और थर्ड जनरेशन (2G & 3G) इथेनॉल पर त्वरित शिफ्ट
भारत को गन्ने के रस या सीधे अनाज जैसी खाद्य फसलों (1G) पर अपनी निर्भरता को तेजी से कम करना होगा। इसके स्थान पर कृषि अपशिष्ट (Crop Residue), धान की पराली, गन्ने की खोई (Bagasse), बांस और नगर पालिकाओं के ठोस जैविक कचरे से इथेनॉल बनाने की तकनीक (Second Generation) को युद्ध स्तर पर बढ़ावा देना चाहिए। इससे पानी की खपत न के बराबर होगी और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण से भी मुक्ति मिलेगी।
२. आधुनिक सिंचाई पद्धतियों की अनिवार्यता (Micro-Irrigation)
सरकार को नीतिगत स्तर पर यह अनिवार्य करना चाहिए कि इथेनॉल उत्पादन के लिए जो भी गन्ना चीनी मिलों को भेजा जाएगा, उसकी खेती केवल और केवल टपकन सिंचाई (Drip Irrigation) या स्प्रिंकलर तकनीक से ही होगी। ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से गन्ने की खेती में पानी की खपत को 50% से 60% तक कम किया जा सकता है।
३. कम पानी वाले वैकल्पिक फीडस्टॉक को प्रोत्साहन
गन्ने के मुकाबले चुकंदर (Sugar Beet), स्वीट सोरघम (ज्वार की एक प्रजाति) और कम पानी वाले मक्के की ऐसी किस्में विकसित की जानी चाहिए जो शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसानी से उग सकें। चुकंदर गन्ने की तुलना में आधा पानी लेता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक उभरती हुई वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत के लिए स्वच्छ, स्वदेशी और आत्मनिर्भर ऊर्जा के स्रोतों को खोजना बेहद अपरिहार्य है। लेकिन नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और समाज को यह शाश्वत सत्य हमेशा याद रखना होगा कि ईंधन का विकल्प खोजा जा सकता है, लेकिन पानी का कोई विकल्प प्रकृति में मौजूद नहीं है।
यदि हम अपनी हवा को साफ करने की कीमत अपने जलस्रोतों को सुखाकर, अपनी नदियों को मृत करके और अपने भूजल को समाप्त करके चुकाएंगे, तो यह सौदा देश के सुनहरे भविष्य के लिए बेहद आत्मघाती और महंगा साबित होगा। समय आ गया है कि भारत अपनी ऊर्जा नीति और जल नीति के बीच एक वैज्ञानिक और समग्र समन्वय स्थापित करे, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा के साथ-साथ भरपूर पानी भी मिल सके। 'हरित ईंधन' की यात्रा भारत को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाए, न कि प्यास के महा-संकट की ओर।
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